दुर्गा अष्टमी (अश्विन शुल्क अष्टमी), दुर्गा अष्टमी को महा अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। 29 सितंबर से शुरू होकर 7 अक्टूबर तक रहेंगी और 8 अक्टूबर को देवी विसर्जन होगा।

जानिए दुर्गा अष्टमी पर क्या करना चाहिए।

इस दिन भगवती दुर्गा का पूजन कर नवरात्रि की पूर्णाहुति की जाती है। भगवती दुर्गा को उबले हुए चने, हलवा-पूरी, खीर आदि का भोग लगाया जाता है। इस दिन देवी दुर्गा की मूर्ति का मंत्रों से विधिपूर्वक पूजन किया जाता है। बहुत से व्यक्ति इस महाशक्ति को प्रसन्न करने के लिए हवन आदि भी करते हैं। शक्तिपीठों में इस दिन बहुत बड़ा उत्सव मनाया जाता है इस दिन कन्या, लगुरा जमाया जाता है। शारदीय नवरात्र

कथा

प्राचीन हिंदू शास्त्रों के अनुसार देवी दुर्गा के नौ रूप है उन सब रूपों ( अवतारों ) कथाएं इस प्रकार है।

महाकाली

एक बार जब प्रलय काल में सारा संसार जलमय था चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देता था, उस समय भगवान विष्णु की नाभि से एक कमल उत्पन्न हुआ। उस कमल से ब्रह्माजी निकले। उसी समय भगवान नारायण के कानो में से जो मैल निकला उससे मधु और कैटभ नाम के दो दैत्य उत्पन्न हुए। जब उन दैत्यों ने चारों ओर देखा तो उन्हें ब्रह्मा जी के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं दिया। वे दोनों कमल पर बैठे ब्रह्माजी पर टूट पड़े, तब भयभीत होकर ब्रह्मा जी ने विष्णु की स्तुति की।

विष्णु जी की आंखों में उस समय महामाया योगनिद्रा के रूम में निवास कर रही थी। ब्रह्मा की स्तुति से वे लोप हो गए और विष्णु भगवान नींद से जाग उठे। उनके जागते ही वे दैत्य भगवान विष्णु से लड़ने लगे और उनमें 5000 वर्ष तक युद्ध चलता रहा।

अंत में भगवान विष्णु की रक्षा के लिए महामाया के असुरो की बुद्धि पलट दी। तब वे असुर प्रसन्न हो विष्णु जी से कहने लगे – ‘हम आपके युद्ध कौशल से प्रसन्न है, जो चाहो सो वर मांग लो।’ भगवान विष्णु बोले- ‘यदि हमें वर देना है तो यह वर दो कि दैत्यों का नाश हो जाए।’

दैत्यों ने कहा- “तथास्तु।” ऐसा कहते ही महाबली दैत्यों का विष्णु जी के हाथों नाश हो गया है। जिसने असुरों की बुद्धि का बदला था वह देवी थी “महाकाली”।